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श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 91: हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  14.91.7 
वैशम्पायन उवाच
यज्ञस्य विधिमग्रॺं वै फलं चापि नराधिप।
गदत: शृणु मे राजन् यथावदिह भारत॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी बोले - नरेश्वर ! भरतनन्दन ! मैं यहाँ यज्ञ की उत्तम विधि और फल का यथावत् वर्णन करता हूँ, आप मेरी बात सुनिए ॥7॥
 
Vaishampayanji said – Nareshwar! Bharatnandan! I describe the best method and outcome of Yagya here exactly, you listen to me. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)