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mahabharat 14.91.37: हे भारतपुत्र! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तपस्या का आश्रय लेते हैं, वे दान की अग्नि में तपकर स्वर्ण के समान शुद्ध होकर स्वर्ग को जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.91: हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 91: हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  14.91.37 
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्रा ये चाश्रितास्तप:।
दानधर्माग्निना शुद्धास्ते स्वर्गं यान्ति भारत॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे भारतपुत्र! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तपस्या का आश्रय लेते हैं, वे दान की अग्नि में तपकर स्वर्ण के समान शुद्ध होकर स्वर्ग को जाते हैं।
 
O son of Bharat! The Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras who take recourse to austerities, after being burnt in the fire of charity, become as pure as gold and go to heaven.
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि हिंसामिश्रधर्मनिन्दायामेकनवतितमोऽध्याय:॥ ९१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें हिंसामिश्रित धर्मकी निन्दाविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)