श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 91: हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  14.91.31 
एवं लब्ध्वा धनं मोहाद् यो हि दद्याद् यजेत वा।
न तस्य स फलं प्रेत्य भुङ्‍क्ते पापधनागमात्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जो मनुष्य आसक्तिवश अन्यायपूर्वक धन कमाकर उससे दान या यज्ञ करता है, वह मरने के बाद भी उसका फल नहीं पाता, क्योंकि वह धन पाप से मिश्रित होता है ॥31॥
 
In this way, one who, out of attachment, earns money through injustice and then performs charity or sacrifices using it, does not reap the benefits even after death, because that money is mixed with sin. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)