श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 91: हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  14.91.25 
तेन दत्तानि दानानि पापेनाशुद्धबुद्धिना।
तानि सर्वाण्यनादृत्य नश्यन्ति विपुलान्यपि॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वह पापी, मलिन बुद्धि वाला मनुष्य कितना ही दान क्यों न दे, वह सब व्यर्थ हो जाता है, व्यर्थ हो जाता है ॥25॥
 
No matter how much charity is given by that sinful man of impure intellect, all of it becomes wasted, becoming worthless. ॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)