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mahabharat 14.91.1: जनमेजय बोले - हे प्रभु! राजा लोग यज्ञ में लगे रहते हैं, महर्षि लोग तपस्या में लगे रहते हैं और ब्राह्मण लोग मनोनिग्रह में स्थित रहते हैं। मन के वश में होने पर इन्द्रियों का वश स्वतः ही हो जाता है। 1॥   |   mahabharat अध्याय 14.91: हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 91: हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.91.1 
जनमेजय उवाच
यज्ञे सक्ता नृपतयस्तप:सक्ता महर्षय:।
शान्तिव्यवस्थिता विप्रा: शमे दम इति प्रभो॥ १॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले - हे प्रभु! राजा लोग यज्ञ में लगे रहते हैं, महर्षि लोग तपस्या में लगे रहते हैं और ब्राह्मण लोग मनोनिग्रह में स्थित रहते हैं। मन के वश में होने पर इन्द्रियों का वश स्वतः ही हो जाता है। 1॥
 
Janamejaya said – Lord! Kings engage in Yagya, Maharshi remain engaged in penance and Brahmins remain situated in peace (manonigraha). When the mind is controlled, control of the senses is automatically accomplished. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)