श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 79-80
 
 
श्लोक  14.90.79-80 
श्वशुर उवाच
अनेन नित्यं साध्वी त्वं शीलवृत्तेन शोभसे।
या त्वं धर्मव्रतोपेता गुरुवृत्तिमवेक्षसे॥ ७९॥
तस्मात् सक्तून् ग्रहीष्यामि वधु नार्हसि वञ्चनाम्।
गणयित्वा महाभागे त्वां हि धर्मभृतां वरे॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
ससुर जी बोले, "पुत्री! तुम एक पतिव्रता स्त्री हो और अपने सदाचार तथा शील से सुशोभित हो। तुम धर्म के मार्ग पर चलकर तथा व्रत रखकर सदैव अपने से बड़ों की सेवा में तत्पर रहती हो; इसलिए हे पुत्रवधू! मैं तुम्हें पुण्य से वंचित नहीं होने दूँगा। हे पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ सौभाग्यवती! मैं तुम्हें पुण्यात्माओं में गिनकर तुम्हारे द्वारा अर्पित सत्तू अवश्य स्वीकार करूँगा।"
 
The father-in-law said, "Daughter! You are a virtuous woman and you are adorned by your good conduct and modesty. You are always devoted to the service of your elders by following the path of religion and fasting; therefore, daughter-in-law! I will not let you be deprived of virtue. O most fortunate among the virtuous! I will certainly accept the sattu (sour flour) offered by you by counting you among the virtuous souls. 79-80.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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