श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  14.90.120 
अद्रोह: सर्वभूतेषु संतोष: शीलमार्जवम्।
तपो दमश्च सत्यं च प्रदानं चेति सम्मितम्॥ १२०॥
 
 
अनुवाद
किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष न रखना, मन में संतुष्ट रहना, सदाचार और सदाचार का पालन करना, सबके प्रति सरलता का व्यवहार करना, तप करना, मन और इन्द्रियों को वश में रखना, सत्य बोलना और भक्तिपूर्वक दान करना, न्यायपूर्वक अर्जित वस्तुएँ दान करना - ये प्रत्येक गुण महान यज्ञ के समान है॥120॥
 
Not to be hostile towards any living being, to remain content in mind, to follow morality and good conduct, to behave with simplicity towards all, to perform austerities, to control the mind and the senses, to speak the truth and to donate with devotion, things earned through fair means - each one of these qualities is equivalent to a great sacrifice.॥120॥
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि नकुलाख्याने नवतितमोेऽध्याय:॥ ९०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें नकुलोपाख्यानविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९०॥

 
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