श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  14.90.119 
न विस्मयस्ते नृपते यज्ञे कार्य: कथंचन।
ऋषिकोटिसहस्राणि तपोभिर्ये दिवं गता:॥ ११९॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! उस यज्ञ के विषय में ऐसी घटना सुनकर आपको किसी भी प्रकार का आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ऐसे हजारों-करोड़ों ऋषि हुए हैं, जो बिना यज्ञ किए केवल तप के बल से दिव्य लोक को प्राप्त हुए हैं। 119॥
 
Nareshwar! You should not be surprised in any way after hearing such an incident regarding that Yagya. There have been thousands and crores of such sages who have reached the divine world only by the power of penance without performing Yagya. 119॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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