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श्लोक  14.86.21 
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिर:।
अभिनन्द्यास्य तद् वाक्यमिदं वचनमब्रवीत्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन का यह सन्देश सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने उन्हें हृदयपूर्वक नमस्कार किया और इस प्रकार कहा।
 
Hearing this message from Arjun, Dharmaraja Yudhishthira greeted him wholeheartedly and said thus.
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे षडशीतितमोऽध्याय:॥ ८६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेध-यज्ञका आरम्भविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)