स्रग्विणश्चापि ते सर्वे सुमृष्टमणिकुण्डला:॥ ४१॥
पर्यवेषन् द्विजातींस्तान् शतशोऽथ सहस्रश:।
विविधान्यन्नपानानि पुरुषा येऽनुयायिन:।
ते वै नृपोपभोज्यानि ब्राह्मणानां ददुश्च ह॥ ४२॥
अनुवाद
वहाँ सैकड़ों-हज़ारों लोगों ने ब्राह्मणों को नाना प्रकार के भोजन परोसे। वे सभी सोने के हार और शुद्ध रत्नजड़ित कुण्डलों से सुसज्जित थे। राजा के अनुयायियों ने वहाँ ब्राह्मणों को नाना प्रकार के भोजन, पेय और राजसी भोजन कराया। 41-42.
Hundreds and thousands of people served various types of food to the Brahmins there. All of them were adorned with gold necklaces and pure gem earrings. The followers of the king offered various types of food and drinks and royal food to the Brahmins there. 41-42.
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे पञ्चाशीतितमोऽध्याय:॥ ८५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका आरम्भविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥