श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 85: यज्ञभूमिकी तैयारी, नाना देशोंसे आये हुए राजाओंका यज्ञकी सजावट और आयोजन देखना  »  श्लोक 14-16
 
 
श्लोक  14.85.14-16 
स्तम्भान् कनकचित्रांश्च तोरणानि बृहन्ति च।
यज्ञायतनदेशेषु दत्त्वा शुद्घं च काञ्चनम्॥ १४॥
अन्त:पुराणां राज्ञां च नानादेशसमीयुषाम्।
कारयामास धर्मात्मा तत्र तत्र यथाविधि॥ १५॥
ब्राह्मणानां च वेश्मानि नानादेशसमीयुषाम्।
कारयामास कौन्तेयो विधिवत् तान्यनेकश:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वहाँ विचित्र स्वर्णमय स्तम्भ और बड़े-बड़े मेहराब (द्वार) थे। धर्मात्मा भीम ने यज्ञवेदी के सभी स्थानों में शुद्ध स्वर्ण का प्रयोग किया था। उन्होंने अंतःपुर की स्त्रियों, विभिन्न देशों से आए राजाओं और विभिन्न स्थानों से आए ब्राह्मणों के निवास के लिए भी अनेक उत्तम भवनों का निर्माण किया था। उन सभी का निर्माण कुन्तीकुमार भीम ने स्थापत्यशास्त्र के नियमों के अनुसार किया था॥14-16॥
 
There were strange golden pillars and big arches (gates). The virtuous Bhima had used pure gold in all the places of the sacrificial altar. He also built many excellent buildings for the residence of the women of the harem, the kings who had come from different countries, and the Brahmins who had come from various places. All of them were constructed by Kuntikumar Bhima according to the rules of architecture.॥14-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)