श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 85: यज्ञभूमिकी तैयारी, नाना देशोंसे आये हुए राजाओंका यज्ञकी सजावट और आयोजन देखना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.85.1 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वानुययौ पार्थो हयं कामविहारिणम्।
न्यवर्तत ततो वाजी येन नागाह्वयं पुरम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! गांधारराज से ऐसा कहकर अर्जुन उस घोड़े का पीछा करने लगे जो स्वेच्छा से आगे बढ़ रहा था। अब वह घोड़ा लौटकर हस्तिनापुर की ओर चल पड़ा॥1॥
 
Vaishampayana says- Janamejaya! After saying this to the king of Gandhar, Arjuna started following the horse which was moving at will. Now that horse returned and started towards Hastinapur.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)