Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.81.5-6: अर्जुन का प्रश्न सुनकर नागराज उलूपी की पुत्री हँस पड़ी और बोली, "हे प्रिय! आपने और बभ्रुवाहन ने मेरे साथ कोई अन्याय नहीं किया है। बभ्रुवाहन की माता ने भी मेरा कोई अहित नहीं किया है। वह सदैव एक दासी की भाँति मेरी आज्ञा में रहती है। मैं तुम्हें वह सब बता रही हूँ जो मैंने यहाँ किया और कैसे किया; कृपया सुनो।" | mahabharat अध्याय 14.81: उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुन: अश्वके पीछे जाना । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तमुवाचोरगपतेर्दुहिता प्रहसन्निव।
न मे त्वमपराद्धोऽसि न हि मे बभ्रुवाहन:॥ ५॥
न जनित्री तथास्येयं मम या प्रेष्यवत् स्थिता।
श्रूयतां यद् यथा चेदं मया सर्वं विचेष्टितम्॥ ६॥
अनुवाद
अर्जुन का प्रश्न सुनकर नागराज उलूपी की पुत्री हँस पड़ी और बोली, "हे प्रिय! आपने और बभ्रुवाहन ने मेरे साथ कोई अन्याय नहीं किया है। बभ्रुवाहन की माता ने भी मेरा कोई अहित नहीं किया है। वह सदैव एक दासी की भाँति मेरी आज्ञा में रहती है। मैं तुम्हें वह सब बता रही हूँ जो मैंने यहाँ किया और कैसे किया; कृपया सुनो।"
Hearing Arjun's question, the daughter of the serpent king Ulupi laughed and said, 'My dear one! You and Babruvahan have not done me any wrong. Babruvahan's mother has also not done me any harm. She always remains under my command like a maid. I am telling you everything I have done here and how; please listen.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥