स तत्र विधिवत् तेन पूजित: पाकशासनि:।
भार्याभ्यामभ्यनुज्ञात: प्रायाद् भरतसत्तम:॥ ३२॥
अनुवाद
तत्पश्चात् वहाँ बभ्रुवाहन ने भरतवंश के श्रेष्ठ पुरुष इन्द्रकुमार अर्जुन की विधिपूर्वक पूजा की और अपनी दोनों पुत्रियों की अनुमति लेकर वे वहाँ से चले गये ॥32॥
Thereafter, there Babhruvahana duly worshiped Indra Kumar Arjun, the best man of Bharat dynasty and he left from there after taking the permission of his two daughters. 32॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे एकाशीतितमोऽध्याय:॥ ८१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वका अनुसरणविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८१॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)