श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 81: उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुन: अश्वके पीछे जाना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  14.81.27 
मम त्वनुग्रहार्थाय प्रविशस्व पुरं स्वकम्।
भार्याभ्यां सह धर्मज्ञ मा भूत् तेऽत्र विचारणा॥ २७॥
 
 
अनुवाद
इस समय मेरी आपसे एक प्रार्थना है - हे धर्मज्ञ! आप मुझ पर कृपा करें और आज ही अपनी दोनों पत्नियों के साथ इस नगर में प्रवेश करें। इस विषय में आप अन्य विचार न करें॥ 27॥
 
‘At this time I have a request for you – O Dharmajna! Please do me a favour and enter this city today with your two wives. You should not think otherwise in this matter.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)