Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.81.21: प्रभु! मैं समझता हूँ कि इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। अथवा आपकी क्या राय है? क्या मैंने यह युद्ध कराकर कोई अपराध किया है?' उलूपी के ऐसा कहने पर अर्जुन का मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने कहा-॥21॥ | mahabharat अध्याय 14.81: उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुन: अश्वके पीछे जाना । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न हि दोषो मम मत: कथं वा मन्यसे विभो।
इत्येवमुक्तो विजय: प्रसन्नात्माब्रवीदिदम्॥ २१॥
अनुवाद
प्रभु! मैं समझता हूँ कि इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। अथवा आपकी क्या राय है? क्या मैंने यह युद्ध कराकर कोई अपराध किया है?' उलूपी के ऐसा कहने पर अर्जुन का मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने कहा-॥21॥
Prabhu! I think that I am not at fault in this. Or what is your opinion? Have I committed any crime by causing this war?' Arjuna's mind became happy when Ulupi said this. He said -॥ 21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥