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mahabharat 14.81.20: प्राणनाथ! युद्ध में देवराज इन्द्र भी तुम्हें परास्त नहीं कर सकते। मेरा पुत्र तो मेरी ही आत्मा है, इसीलिए तुम यहाँ उसके हाथों पराजित हुए हो।   |   mahabharat अध्याय 14.81: उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुन: अश्वके पीछे जाना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 81: उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुन: अश्वके पीछे जाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  14.81.20 
न हि त्वां देवराजोऽपि समरेषु पराजयेत्।
आत्मा पुत्र: स्मृतस्तस्मात् तेनेहासि पराजित:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
प्राणनाथ! युद्ध में देवराज इन्द्र भी तुम्हें परास्त नहीं कर सकते। मेरा पुत्र तो मेरी ही आत्मा है, इसीलिए तुम यहाँ उसके हाथों पराजित हुए हो।
 
Praananath! Even Devraj Indra cannot defeat you in battle. My son is my own soul, that is why you have been defeated here at his hands.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)