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mahabharat 14.80.55: बादलों के समान गम्भीर ध्वनि करने वाले देवताओं के तुरहियाँ बिना बजाए ही बजने लगीं और आकाश में स्तुति का महान शब्द गूँजने लगा ॥55॥   |   mahabharat अध्याय 14.80: चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्‍गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुन: जीवित होना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 80: चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्‍गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुन: जीवित होना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  14.80.55 
अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्मेघनि:स्वना:।
साधु साध्विति चाकाशे बभूव सुमहान् स्वन:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
बादलों के समान गम्भीर ध्वनि करने वाले देवताओं के तुरहियाँ बिना बजाए ही बजने लगीं और आकाश में स्तुति का महान शब्द गूँजने लगा ॥55॥
 
The trumpets of the Gods, which sound as solemn as the clouds, started ringing without even playing and a great sound of praise began to echo in the sky. 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)