श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 80: चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्‍गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुन: जीवित होना  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  14.80.46-47 
जिज्ञासुर्ह्येष पुत्रस्य बलस्य तव कौरव:।
संग्रामे युद्धॺतो राजन्नागत: परवीरहा॥ ४६॥
तस्मादसि मया पुत्र युद्धाय परिचोदित:।
मा पापमात्मन: पुत्र शङ्केथा ह्यण्वपि प्रभो॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
राजा! तुम उनके पुत्र हो। शत्रु योद्धाओं का संहार करने वाले कुरुकुल तिलक अर्जुन ने युद्ध में लड़ते समय तुम्हारे समान पुत्र का पराक्रम जानना चाहा था। बालक! इसीलिए मैंने तुम्हें युद्ध के लिए प्रेरित किया है। हे पराक्रमी पुत्र! तुम्हें अपने में लेशमात्र भी पाप की आशंका नहीं करनी चाहिए। 46-47॥
 
King! You are his son. Kurukula Tilak Arjun, the slayer of enemy warriors, wanted to know the might of a son like you while fighting in battle. Child! That is why I have inspired you for war. Powerful son! You should not suspect even an iota of sin in yourself. 46-47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)