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श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 80: चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्‍गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुन: जीवित होना  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  14.80.41-42 
वैशम्पायन उवाच
प्रायोपविष्टे नृपतौ मणिपूरेश्वरे तदा।
पितृशोकसमाविष्टे सह मात्रा परंतप॥ ४१॥
उलूपी चिन्तयामास तदा संजीवनं मणिम्।
स चोपातिष्ठत तदा पन्नगानां परायणम्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं, "हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले जनमेजय! जब मणिपुर के राजा बभ्रुवाहन अपने पिता के निधन से दुःखी होकर अपनी माता के साथ आमरण अनशन पर बैठ गए, तब उलूपी को संजीवनमणि का स्मरण हुआ। वह मणि, जो सर्पों के जीवन का आधार है, स्मरण करते ही वहाँ प्रकट हो गई।" 41-42.
 
Vaishampayana says, "O Janamejaya, who torments the enemies! When the King of Manipur Babruvahan, who was saddened by the loss of his father, sat down with his mother to fast unto death, Ulupi remembered the Sanjivanmani. That mani, which is the basis of the life of the serpents, appeared there as soon as he remembered it. 41-42.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)