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mahabharat 14.80.1: वैशम्पायनजी कहते हैं: 'जनमेजय! तत्पश्चात्, डरपोक स्वभाव वाली और कमल-नेत्र वाली चित्रांगदा अपने पति के वियोग से व्याकुल हो गई और बहुत विलाप करती हुई मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ी॥1॥   |   mahabharat अध्याय 14.80: चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्‍गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुन: जीवित होना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 80: चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्‍गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुन: जीवित होना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.80.1 
वैशम्पायन उवाच
ततो बहुतरं भीरुर्विलप्य कमलेक्षणा।
मुमोह दु:खसंतप्ता पपात च महीतले॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: 'जनमेजय! तत्पश्चात्, डरपोक स्वभाव वाली और कमल-नेत्र वाली चित्रांगदा अपने पति के वियोग से व्याकुल हो गई और बहुत विलाप करती हुई मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ी॥1॥
 
Vaishmpayana says: 'Janamejaya! Thereafter, Chitrangada, who was of timid nature and lotus-eyed, became distressed at the pain of separation from her husband and while lamenting a lot, fainted and fell on the ground.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)