श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 8: संवर्तका मरुत्तको सुवर्णकी प्राप्तिके लिये महादेवजीकी नाममयी स्तुतिका उपदेश और धनकी प्राप्ति तथा मरुत्तकी सम्पत्तिसे बृहस्पतिका चिन्तित होना  »  श्लोक d9-d10h
 
 
श्लोक  14.8.d9-d10h 
भक्तानां सुलभं तं हि दुर्लभं दूरपातिनाम्।
अदूरस्थममुं देवं प्रकृते: परत: स्थितम्॥
नमामि सर्वलोकस्थं व्रजामि शरणं शिवम्।)
 
 
अनुवाद
मैं उन सर्वव्यापी महादेव शिव को प्रणाम करता हूँ और उनकी शरण लेता हूँ, जो भक्तों के लिए सहज ही सुलभ हैं और दूर रहने वालों के लिए उन्हें पाना कठिन है, जो सबके निकट और प्रकृति से परे स्थित हैं।
 
I bow to and take refuge in the all-pervading Mahadeva Shiva, who is easily accessible to devotees and difficult to find for those who are far away, who is situated close to all and beyond nature.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)