श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 8: संवर्तका मरुत्तको सुवर्णकी प्राप्तिके लिये महादेवजीकी नाममयी स्तुतिका उपदेश और धनकी प्राप्ति तथा मरुत्तकी सम्पत्तिसे बृहस्पतिका चिन्तित होना  »  श्लोक 4-6
 
 
श्लोक  14.8.4-6 
तत्र रुद्राश्च साध्याश्च विश्वेऽथ वसवस्तथा।
यमश्च वरुणश्चैव कुबेरश्च सहानुग:॥ ४॥
भूतानि च पिशाचाश्च नासत्यावपि चाश्विनौ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव यक्षा देवर्षयस्तथा॥ ५॥
आदित्या मरुतश्चैव यातुधानाश्च सर्वश:।
उपासन्ते महात्मानं बहुरूपमुमापतिम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उस पर्वत पर रुद्रगण, साध्यगण, विश्वेदेवगण, वसुगण, यमराज, वरुण, कुबेर अपने अनुचरों सहित, भूत, पिशाच, अश्विनी कुमार, गंधर्व, अप्सरा, यक्ष, देवर्षि, आदित्यगण, मरुद्गण और यातुधागण सब प्रकार से अनेक रूपों में उमावल्लभ परमेश्वर शिव की पूजा करते हैं। 4-6॥
 
On that mountain, Rudragan, Sadhyagan, Vishwadevgan, Vasugan, Yamraj, Varun, Kuber along with his attendants, ghosts, vampires, Ashwini Kumar, Gandharva, Apsara, Yaksha, Devarshi, Adityagan, Marudgan and Yatudhagan worship Umavallabh Supreme God Shiva in many forms in every way. 4-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)