श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 8: संवर्तका मरुत्तको सुवर्णकी प्राप्तिके लिये महादेवजीकी नाममयी स्तुतिका उपदेश और धनकी प्राप्ति तथा मरुत्तकी सम्पत्तिसे बृहस्पतिका चिन्तित होना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  14.8.38 
तं श्रुत्वा भृशसंतप्तं देवराजो बृहस्पतिम्।
अधिगम्यामरवृत: प्रोवाचेदं वचस्तदा॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
जब देवराज इन्द्र ने सुना कि बृहस्पतिजी अत्यन्त दुःखी हैं, तब वे अन्य देवताओं के साथ उनके पास गए और उनसे निम्नलिखित प्रश्न पूछने लगे।
 
When Devaraj Indra heard that Brihaspatiji was extremely distressed, he went to him along with the other gods and began to ask him the following questions. 38.
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये अष्टमोऽध्याय:॥ ८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)