श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 75: अर्जुनका प्राग्ज्योतिषपुरके राजा वज्रदत्तके साथ युद्ध  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  14.75.1-2 
वैशम्पायन उवाच
प्राग्ज्योतिषमथाभ्येत्य व्यचरत् स हयोत्तम:।
भगदत्तात्मजस्तत्र निर्ययौ रणकर्कश:॥ १॥
स हयं पाण्डुपुत्रस्य विषयान्तमुपागतम्।
युयुधे भरतश्रेष्ठ वज्रदत्तो महीपति:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात वह श्रेष्ठ अश्व प्राग्ज्योतिषपुर में पहुँचकर विचरण करने लगा। वहाँ भगदत्त का पुत्र वज्रदत्त राज्य करता था, जो युद्ध में बड़ा ही बलवान था। भरतश्रेष्ठ! जब उसे यह ज्ञात हुआ कि पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर का घोड़ा उसके राज्य की सीमा में पहुँच गया है, तब राजा वज्रदत्त नगर से बाहर आकर युद्ध के लिए तैयार हो गया। 1-2॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter that excellent horse reached Pragjyotishpur and started wandering. Bhagadatta's son Vajradatta ruled there, who was very tough in war. Bharatshrestha! When he came to know that the horse of Pandu's son Yudhishthira had reached the limits of his kingdom, then King Vajradatta came out of the city and got ready for war. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)