श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 72: व्यासजीकी आज्ञासे अश्वकी रक्षाके लिये अर्जुनकी, राज्य और नगरकी रक्षाके लिये भीमसेन और नकुलकी तथा कुटुम्ब-पालनके लिये सहदेवकी नियुक्ति  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  14.72.1-2 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कृष्णेन धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:।
व्यासमामन्त्र्य मेधावी ततो वचनमब्रवीत्॥ १॥
यदा कालं भवान् वेत्ति हयमेधस्य तत्त्वत:।
दीक्षयस्व तदा मां त्वं त्वय्यायत्तो हि मे क्रतु:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भगवान श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर बुद्धिमान धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने व्यासजी को संबोधित करते हुए कहा - 'भगवन! जब आप अश्वमेध यज्ञ आरम्भ करने का उचित समय पाएँ, तभी आकर मुझे उसमें दीक्षित करें; क्योंकि मेरा यज्ञ आपके अधीन है।'॥1-2॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing this from Lord Krishna, the intelligent son of Dharma, Yudhishthira addressed Vyasji and said - 'Lord! When you find the right time to start the Ashwamedha Yagna, then only come and initiate me into it; because my Yagna is under your control.'॥ 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)