श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 69: उत्तराका विलाप और भगवान‍् श्रीकृष्णका उसके मृत बालकको जीवन-दान देना  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  14.69.7-8 
पुत्र गत्वा मम वचो ब्रूयास्त्वं पितरं त्विदम्।
दुर्मरं प्राणिनां वीर कालेऽप्राप्ते कथंचन॥ ७॥
याहं त्वया विनाद्येह पत्या पुत्रेण चैव ह।
मर्तव्ये सति जीवामि हतस्वस्तिरकिंचना॥ ८॥
 
 
अनुवाद
पुत्र! परलोक जाकर अपने पिता से मेरी यह बात कहना - 'वीर! जीवों का जीवन का अंत आने से पहले किसी भी प्रकार मरना बहुत कठिन है। इसीलिए मैं तुम्हारे जैसे पति और इस पुत्र से वियोग होने पर भी, जबकि मुझे मर जाना चाहिए था, अब तक यहाँ रह रही हूँ; मेरा सारा सुख नष्ट हो गया है। मैं निराश्रित हो गई हूँ।'
 
‘Son! Go to the other world and tell your father this thing of mine – ‘Valiant! It is very difficult for living beings to die in any way before the end of their life comes. That is why I am still living here even after being separated from a husband like you and this son when I should have died; all my happiness has been destroyed. I have become destitute.’
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)