श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 65: ब्राह्मणोंकी आज्ञासे भगवान‍् शिव और उनके पार्षद आदिकी पूजा करके युधिष्ठिरका उस धनराशिको खुदवाकर अपने साथ ले जाना  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  14.65.9-10h 
धूपगन्धनिरुद्धं तत् सुमनोभिश्च संवृतम्॥ ९॥
शुशुभे स्थानमत्यर्थं देवदेवस्य पार्थिव।
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वीनाथ! परमपिता परमेश्वर महादेव का वह स्थान धूपबत्ती की सुगंध से युक्त तथा पुष्पों से सुसज्जित होने के कारण अत्यंत सुंदर लग रहा था।
 
Prithvi Nath! That place of the Supreme God Mahadev was looking very beautiful due to the fragrance of incense and being decorated with flowers. 9 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)