श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 64: पाण्डवोंका हिमालयपर पहुँचकर वहाँ पड़ाव डालना और रातमें उपवासपूर्वक निवास करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.64.1 
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते प्रययुर्हृष्टा: प्रहृष्टनरवाहना:।
रथघोषेण महता पूरयन्तो वसुंधराम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, 'हे जनमेजय! पाण्डवों के साथ आने वाले सभी लोग और वाहन महान आनन्द से भर गए थे। वे स्वयं भी अपने रथों की गर्जना से पृथ्वी को गुंजायमान करते हुए आनन्दपूर्वक यात्रा कर रहे थे।
 
Vaishmpayana says, 'O Janamejaya! All the people and vehicles accompanying the Pandavas were filled with great joy. They themselves were travelling happily, resonating the earth with the loud noise of their chariots.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)