श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 63: युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना  »  श्लोक 5-7
 
 
श्लोक  14.63.5-7 
तपोवृद्धेन महता सुहृदां भूतिमिच्छता॥ ५॥
गुरुणा धर्मशीलेन व्यासेनाद्भुतकर्मणा।
भीष्मेण च महाप्राज्ञा गोविन्देन च धीमता॥ ६॥
संस्मृत्य तदहं सम्यक् कर्तुमिच्छामि पाण्डवा:।
आयत्यां च तदात्वे च सर्वेषां तद्धि नो हितम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
महामुनि, धर्मात्मा गुरु व्यास, अद्भुत पराक्रमी भीष्म तथा अपने मित्रों का हित चाहने वाले बुद्धिमान गोविन्द द्वारा समय-समय पर दिए गए उपदेशों का स्मरण करके मैं उनकी आज्ञा का भली-भाँति पालन करना चाहता हूँ। हे महाज्ञानी पाण्डवों! उन महात्माओं के ये वचन हम सबके लिए वर्तमान के साथ-साथ भविष्य में भी कल्याणकारी हैं। 5-7॥
 
Remembering the advice given from time to time by the great sage, the virtuous Guru Vyas, the wonderful valiant Bhishma and the wise Govinda, who wishes the welfare of his friends, I wish to follow their orders very well. Great wise Pandavas! These words of those Mahatmas are beneficial for all of us in the future as well as in the present. 5-7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)