श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 63: युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  14.63.1-2 
जनमेजय उवाच
श्रुत्वैतद् वचनं ब्रह्मन् व्यासेनोक्तं महात्मना।
अश्वमेधं प्रति तदा किं भूय: प्रचकार ह॥ १॥
रत्नं च यन्मरुत्तेन निहितं वसुधातले।
तदवाप कथं चेति तन्मे ब्रूहि द्विजोत्तम॥ २॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन्! महात्मा व्यास के ये वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ के सम्बन्ध में क्या किया? राजा मरुत द्वारा पृथ्वी पर छोड़े गए रत्नों को उन्होंने किस प्रकार प्राप्त किया? हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यह सब मुझे बताओ।॥1-2॥
 
Janamejaya asked - Brahman! After listening to these words of Mahatma Vyasa, what did King Yudhishthira do in connection with the Ashwamedha Yagna? How did he retrieve the gems that King Marut had left on the earth? O best of Brahmins! Tell me all this.॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)