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श्री महाभारत
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पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
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अध्याय 62: वसुदेव आदि यादवोंका अभिमन्युके निमित्त श्राद्ध करना तथा व्यासजीका उत्तरा और अर्जुनको समझाकर युधिष्ठिरको अश्वमेधयज्ञ करनेकी आज्ञा देना
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श्लोक 21
श्लोक
14.62.21
धर्मराजोऽपि मेधावी श्रुत्वा व्यासस्य तद्वच:।
वित्तस्यानयने तात चकार गमने मतिम्॥ २१॥
अनुवाद
तात! व्यासजी के वचन सुनकर बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर ने धन लाने के लिए हिमालय पर जाने का विचार किया॥21॥
Tat! Hearing the words of Vyasji, the wise Dharmaraja Yudhishthir thought of traveling to the Himalayas to bring wealth. 21॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वासुदेवसान्त्वने द्विषष्टितमोऽध्याय:॥ ६२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णकी सान्त्वनाविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६२॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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