श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 6: नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्तिके अनुसार संवर्तसे भेंट करना  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  14.6.20-21 
मरुत्त उवाच
संजीवितोऽहं भवता वाक्येनानेन नारद।
पश्येयं क्व नु संवर्तं शंस मे वदतां वर॥ २०॥
कथं च तस्मै वर्तेयं कथं मां न परित्यजेत्।
प्रत्याख्यातश्च तेनापि नाहं जीवितुमुत्सहे॥ २१॥
 
 
अनुवाद
मरुत बोले - हे वक्ताओं में श्रेष्ठ नारद जी! आपने मुझे यह बताकर जीवनदान दिया है। अब आप ही बताइए कि मैं संवर्त मुनीक के दर्शन कहाँ कर सकूँगा? उनके साथ कैसा व्यवहार करूँ? मैं ऐसा कैसा व्यवहार करूँ कि वे मेरा परित्याग न कर दें? यदि वे भी मेरी प्रार्थना अस्वीकार कर दें तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगा ॥20-21॥
 
Marut said - O best of speakers, Narada ji! You have given me life by telling me this. Now tell me where will I be able to see Samvarta Munika? How should I behave with him? How should I behave so that he does not abandon me? If he also rejects my request then I will not be able to survive. ॥20-21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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