श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 59: भगवान‍् श्रीकृष्णका द्वारकामें जाकर रैवतक पर्वतपर महोत्सवमें सम्मिलित होना और सबसे मिलना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.59.5 
अलंकृतस्तु स गिरिर्नानारूपैर्विचित्रितै:।
बभौ रत्नमयै: कोशै: संवृत: पुरुषर्षभ॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे महात्मन! वह पर्वत नाना प्रकार के विचित्र रत्नों के ढेरों से सुशोभित था; उस समय वह अत्यन्त सुन्दर दिख रहा था॥5॥
 
O great man! That mountain was decorated with heaps of various kinds of strange gems; it was looking very beautiful at that time. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)