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mahabharat 14.58.7: हे चराचर जगत में श्रेष्ठ ब्राह्मण! अब मैं इस लोक में सुख प्राप्त करने तथा परलोक में स्वर्गीय सुख भोगने का कोई दूसरा उपाय नहीं देखता।॥7॥   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  14.58.7 
न चान्यामपि पश्यामि गतिं गतिमतां वर।
स्वर्गद्वारस्य गमने स्थाने चेह द्विजोत्तम॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे चराचर जगत में श्रेष्ठ ब्राह्मण! अब मैं इस लोक में सुख प्राप्त करने तथा परलोक में स्वर्गीय सुख भोगने का कोई दूसरा उपाय नहीं देखता।॥7॥
 
O great Brahmin among all the moving creatures! Now I do not see any other way to attain happiness in this world and to enjoy the heavenly happiness in the next world. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)