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mahabharat 14.58.61: हे भरतश्रेष्ठ! जिन उत्तंक मुनि के विषय में आप मुझसे पूछ रहे थे, वे भी उतने ही प्रभावशाली तथा महान तपस्वी थे।   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  14.58.61 
एवंप्रभाव: स मुनिरुत्तङ्को भरतर्षभ।
परेण तपसा युक्तो यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! जिन उत्तंक मुनि के विषय में आप मुझसे पूछ रहे थे, वे भी उतने ही प्रभावशाली तथा महान तपस्वी थे।
 
O best of the Bharatas! The sage Uttanka, about whom you were asking me, was equally impressive and a great ascetic. 61.
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५८॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकका उपाख्यानविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)