Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 14.58.60: जनमेजय! इस प्रकार महात्मा उत्तंक ने तीनों लोकों में भ्रमण करके उन बहुमूल्य दिव्य कुण्डलों को प्राप्त किया था ॥60॥   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  14.58.60 
एवं महात्मना तेन त्रीँल्लोकान् जनमेजय।
परिक्रम्याहृते दिव्ये ततस्ते मणिकुण्डले॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! इस प्रकार महात्मा उत्तंक ने तीनों लोकों में भ्रमण करके उन बहुमूल्य दिव्य कुण्डलों को प्राप्त किया था ॥60॥
 
Janamejaya! In this way, Mahatma Uttanka had obtained those precious divine earrings by roaming in all the three worlds. 60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)