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mahabharat 14.58.57: तत्पश्चात् महाबली उत्तंक मुनि सर्पों द्वारा सम्मानित होकर अग्निदेव की परिक्रमा करके अपने गुरु के आश्रम की ओर चले ॥57॥   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  14.58.57 
तत: स पूजितो नागैस्तदोत्तङ्क: प्रतापवान्।
अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा जगाम गुरुसद्म तत्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् महाबली उत्तंक मुनि सर्पों द्वारा सम्मानित होकर अग्निदेव की परिक्रमा करके अपने गुरु के आश्रम की ओर चले ॥57॥
 
Thereafter, the mighty sage Uttank, after being honoured by the serpents, circumambulated Agnidev and proceeded towards his Guru's hermitage. ॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)