vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
»
अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना
»
श्लोक 56
श्लोक
14.58.56
प्रसाद्य ब्राह्मणं ते तु पाद्यमर्घ्यं निवेद्य च।
प्रायच्छन् कुण्डले दिव्ये पन्नगा: परमार्चिते॥ ५६॥
अनुवाद
इस प्रकार प्रसन्न होकर सर्पों ने ब्राह्मण को जल-अर्पण किया तथा दो अत्यंत पूजनीय दिव्य कुण्डल भी लौटा दिए।
Having thus pleased the Brahmin, the serpents offered him water and water and also returned the two highly revered divine earrings.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×