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mahabharat 14.58.56: इस प्रकार प्रसन्न होकर सर्पों ने ब्राह्मण को जल-अर्पण किया तथा दो अत्यंत पूजनीय दिव्य कुण्डल भी लौटा दिए।   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  14.58.56 
प्रसाद्य ब्राह्मणं ते तु पाद्यमर्घ्यं निवेद्य च।
प्रायच्छन् कुण्डले दिव्ये पन्नगा: परमार्चिते॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार प्रसन्न होकर सर्पों ने ब्राह्मण को जल-अर्पण किया तथा दो अत्यंत पूजनीय दिव्य कुण्डल भी लौटा दिए।
 
Having thus pleased the Brahmin, the serpents offered him water and water and also returned the two highly revered divine earrings.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)