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mahabharat 14.58.46-47: घोड़े ने कहा- ब्रह्मन्! मैं तुम्हारे गुरु का भी गुरु हूँ, जातवेद अग्नि, यह तुम्हें भली-भाँति जानना चाहिए। भृगु नंदन! तुम सदैव अपने गुरु के लिए पवित्र रहे हो और नियमपूर्वक मेरी पूजा की है। अतः मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा। अब तुम मेरे कहे अनुसार कार्य करो, विलम्ब न करो। 46-47।   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  14.58.46-47 
अश्व उवाच
गुरोर्गुरुं मां जानीहि ज्वलनं जातवेदसम्।
त्वया ह्यहं सदा विप्र गुरोरर्थेऽभिपूजित:॥ ४६॥
विधिवत् सततं विप्र शुचिना भृगुनन्दन।
तस्माच्छ्रेयो विधास्यामि तवैवं कुरु मा चिरम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
घोड़े ने कहा- ब्रह्मन्! मैं तुम्हारे गुरु का भी गुरु हूँ, जातवेद अग्नि, यह तुम्हें भली-भाँति जानना चाहिए। भृगु नंदन! तुम सदैव अपने गुरु के लिए पवित्र रहे हो और नियमपूर्वक मेरी पूजा की है। अतः मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा। अब तुम मेरे कहे अनुसार कार्य करो, विलम्ब न करो। 46-47।
 
The horse said-Brahman! I am the Guru of your Guru as well, Jaatveda Agni, you should know this well. Bhrigu Nandan! You have always remained pure for your Guru and have worshipped me according to the rules. Therefore, I will do good to you. Now you do the work as per my instructions, do not delay. 46-47.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)