श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  14.58.45 
उत्तङ्क उवाच
कथं भवन्तं जानीयामुपाध्यायाश्रमं प्रति।
यन्मया चीर्णपूर्वं हि श्रोतुमिच्छामि तद्‍ध्यहम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक ने पूछा - 'मुझे कैसे मालूम कि गुरुदेव के आश्रम में मैं आपसे कभी मिला हूँ? तथा आपकी सलाह से वहाँ रहकर मैंने कौन-सा कार्य अनेक बार किया है? मैं उसे सुनना चाहता हूँ॥ 45॥
 
Uttanka asked, 'How do I know that I have ever met you at Gurudev's hermitage? And as per your advice, what is the work that I have done many times while staying there? I want to hear about it.॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)