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mahabharat 14.58.43: उन्होंने उत्तंक से कहा - विप्रवर ! तुम मेरे इस मार्ग पर फूंक मारो । ऐसा करने से तुम्हें वे दोनों कुण्डल प्राप्त हो जायेंगे, जो ऐरावतपुत्र तुम्हारे लिए लाया है । 43॥   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  14.58.43 
धमस्वापानमेतन्मे ततस्त्वं विप्र लप्स्यसे।
ऐरावतसुतेनेह तवानीते हि कुण्डले॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने उत्तंक से कहा - विप्रवर ! तुम मेरे इस मार्ग पर फूंक मारो । ऐसा करने से तुम्हें वे दोनों कुण्डल प्राप्त हो जायेंगे, जो ऐरावतपुत्र तुम्हारे लिए लाया है । 43॥
 
He said to Uttanka – Vipravara! You blow on this path of mine. By doing this, you will get both the earrings that Airavata's son has brought to you. 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)