Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 14.58.41: नागलोक की विशालता देखकर उत्तंक मुनि दुःखी और निराश हो गए। अब उन्हें कुण्डल पुनः प्राप्त होने की कोई आशा नहीं रही। 41.   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  14.58.41 
नागलोकमुत्तङ्कस्तु प्रेक्ष्य दीनोऽभवत् तदा।
निराशश्चाभवत् तत्र कुण्डलाहरणे पुन:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
नागलोक की विशालता देखकर उत्तंक मुनि दुःखी और निराश हो गए। अब उन्हें कुण्डल पुनः प्राप्त होने की कोई आशा नहीं रही। 41.
 
Seeing the vastness of Nagaloka, Uttanka Muni became sad and disheartened. Now he did not have any hope of getting the earrings again. 41.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)