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श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  14.58.40 
तस्य लोकस्य च द्वारं स ददर्श भृगूद्वह:।
पञ्चयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
भृगुकुलतिलक उत्तंक ने नागलोक का बाहरी द्वार देखा, जो सौ योजन लम्बा और पाँच योजन चौड़ा था।
 
Bhrigukulatilaka Uttank saw the outer gate of Nagaloka, which was a hundred yojanas long and five yojanas wide.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)