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mahabharat 14.58.4: उन कुण्डलों को पाकर मुनि उत्तंक पुनः राजा के पास आये और बोले, 'पृथ्वी के स्वामी! मैं आपके गूढ़ वचनों का अर्थ सुनना चाहता हूँ।'   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  14.58.4 
अवाप्य कुण्डले ते तु राजानं पुनरब्रवीत्।
किमेतद् गुह्यवचनं श्रोतुमिच्छामि पार्थिव॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उन कुण्डलों को पाकर मुनि उत्तंक पुनः राजा के पास आये और बोले, 'पृथ्वी के स्वामी! मैं आपके गूढ़ वचनों का अर्थ सुनना चाहता हूँ।'
 
Having found those earrings, sage Uttanka again came to the king and said, 'Lord of the Earth! I wish to hear the meaning of your cryptic words.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)