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mahabharat 14.58.34: उत्तंक ने कहा- ब्रह्मन्! द्विजश्रेष्ठ! यदि नागलोक जाकर उन कुण्डलों को प्राप्त करना मेरे लिए असम्भव हो, तो मैं आपके समक्ष अपने प्राण त्याग दूँगा॥34॥   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  14.58.34 
उत्तङ्क उवाच
नागलोके यदि ब्रह्मन् न शक्ये कुण्डले मया।
प्राप्तुं प्राणान् विमोक्ष्यामि पश्यतस्तु द्विजोत्तम॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक ने कहा- ब्रह्मन्! द्विजश्रेष्ठ! यदि नागलोक जाकर उन कुण्डलों को प्राप्त करना मेरे लिए असम्भव हो, तो मैं आपके समक्ष अपने प्राण त्याग दूँगा॥34॥
 
Uttanka said – Brahman! Dwijshreshtha! If it is impossible for me to go to Nagalok and get those earrings, then I will sacrifice my life in front of you. 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)