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mahabharat 14.58.22-23h: उस समय उसकी दृष्टि लताओं पर ही लगी हुई थी (वह इस बात पर ध्यान नहीं दे रहा था कि वे कहाँ गिरेंगी)। हे प्रभु! उसने जितनी लताएँ तोड़ी थीं, लगभग सभी उस मृगचर्म पर गिर पड़ीं, जिसमें ब्राह्मण ने वे दोनों कुण्डलियाँ बाँध रखी थीं।   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  14.58.22-23h 
अथ पातयमानस्य बिल्वापहृतचक्षुष:।
न्यपतंस्तानि बिल्वानि तस्मिन्नेवाजिने विभो॥ २२॥
यस्मिंस्ते कुण्डले बद्धे तदा द्विजवरेण वै।
 
 
अनुवाद
उस समय उसकी दृष्टि लताओं पर ही लगी हुई थी (वह इस बात पर ध्यान नहीं दे रहा था कि वे कहाँ गिरेंगी)। हे प्रभु! उसने जितनी लताएँ तोड़ी थीं, लगभग सभी उस मृगचर्म पर गिर पड़ीं, जिसमें ब्राह्मण ने वे दोनों कुण्डलियाँ बाँध रखी थीं।
 
At that time his eyes were fixed on the creepers only (he was not paying attention to where they would fall). O Lord! Almost all the creepers that he had plucked fell on the deerskin in which the Brahmin had tied those two earrings.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)