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mahabharat 14.58.20-21: शत्रुनाशक! रास्ते में एक स्थान पर उन्हें बहुत भूख लगी। पास ही उन्हें फलों के भार से झुका हुआ एक बेल का वृक्ष दिखाई दिया। ब्रह्मर्षि उत्तंक उस वृक्ष पर चढ़ गए और उस काले मृगचर्म को उसकी एक शाखा से बाँध दिया। फिर उस ब्राह्मण ने बेलों को तोड़कर गिराना शुरू कर दिया।   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  14.58.20-21 
स कस्मिंश्चित् क्षुधाविष्ट: फलभारसमन्वितम्।
बिल्वं ददर्श विप्रर्षिरारुरोह च तं तत:॥ २०॥
शाखामासज्य तस्यैव कृष्णाजिनमरिंदम।
पातयामास बिल्वानि तदा स द्विजपुङ्गव:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
शत्रुनाशक! रास्ते में एक स्थान पर उन्हें बहुत भूख लगी। पास ही उन्हें फलों के भार से झुका हुआ एक बेल का वृक्ष दिखाई दिया। ब्रह्मर्षि उत्तंक उस वृक्ष पर चढ़ गए और उस काले मृगचर्म को उसकी एक शाखा से बाँध दिया। फिर उस ब्राह्मण ने बेलों को तोड़कर गिराना शुरू कर दिया।
 
Enemy destroyer! On the way, at one place, they felt very hungry. Nearby, they saw a vine tree bent under the weight of fruits. Brahmarishi Uttank climbed that tree and tied that black deerskin to one of its branches. Then that Brahmin started breaking the vines and dropping them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)