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mahabharat 14.58.18: उत्तंक अपने गुरु की पत्नी से प्रेम करते थे, उन्होंने दोनों दिव्य कुण्डल ले लिये और बड़ी तेजी से गौतम के आश्रम की ओर चल पड़े।   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  14.58.18 
गृहीत्वा कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्या: प्रियंकर:।
जवेन महता प्रायाद् गौतमस्याश्रमं प्रति॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक अपने गुरु की पत्नी से प्रेम करते थे, उन्होंने दोनों दिव्य कुण्डल ले लिये और बड़ी तेजी से गौतम के आश्रम की ओर चल पड़े।
 
Uttanka, who loved his Guru's wife, took both the divine earrings and proceeded towards Gautama's hermitage with great speed. 18.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)