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mahabharat 14.58.13: पृथ्वीनाथ! हे महात्मन! आज मैं आपसे मित्रता कर चुका हूँ, अतः कृपया मुझे अच्छी सलाह दीजिए॥13॥   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  14.58.13 
स भवान् मित्रतामद्य सम्प्राप्तो मम पार्थिव।
स मे बुद्धिं प्रयच्छस्व सम्मतां पुरुषर्षभ॥ १३॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! हे महात्मन! आज मैं आपसे मित्रता कर चुका हूँ, अतः कृपया मुझे अच्छी सलाह दीजिए॥13॥
 
Prithvinath! O great man! Today I have become friends with you, so please give me good advice. ॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)